Manan!

रुआंसा हृदय, वेदना भरा वो हर-एक पल व्यापक था उन दिनों, मुझे भूला कर निकल पड़ा था तू घर से, स्वायत्त ! पीठ के बल चरमराते गिरे, सपने निष्फल। अकुलाहट की टीस तुझे भी छूई, मंद व असहाय, तेरी अश्रुपूर्ण छवि, मुझे दूर लेजाती गाड़ी के पिछले शीशे में उभरी, हॉस्टल के मैदान के बाहर […]

लकड़ी का मकान!

लम्बी सीधी खड़ी इमारतों के एक छोटे स्पाट घरोंदे में बंद, अक़सर याद किया करता हूँ वो लकड़ी का मकान। जिसमे गिरते-पड़ते स्कूल से भागकर पहुँचते थे, जहां कमरे की खुली खिड़की ताका करती थी मैदान को, आवाज़ आने की देर होती थी, के सारे काम काज भूल जाया करते थे। खड़े सूरज की गर्मी […]