Mortified!

I remain motionless sitting in my car, gazing up at your window. Maybe by any miraculous chance the curtains slide and i catch your glimpse, then would come a gesture implying you’ll be beside me any moment now. That moment doesn’t arrive and it may never, it seems. I wander around at all those places…

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The Dunces!

In the midst of this placid state, remains hidden incognito, a fervour in some. They saunter around looking like a dunce but hold their ken hidden deep within, waiting for the opportune moment when their ideas take a fully formed contour, for that will be the time, when obliquity of the prevailing system will be…

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Accursed Me!

It is spectacular to see the way by which you are leading your life, I guess perhaps the whole genesis of this temporal existence lies in your excellent finesse to subsist under this system. I often empathise with my accursed soul which relentlessly tries to shed away the very thought of my dearest folks and…

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AMOUR!

I recognise this turbulent storm that has again desolated me and robbed me of my pith, and, perhaps will make me squander on the trifles. It seems like nadir of my futile existence has arrived yet again, but this time its gravely prudent. Although it overwhelms me to have to be the one blessed with…

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आईना!

आईने का रहस्य बहुत पेचीदा है, इसमें जो अक्स है झलकता वो जिंदा है तुम्हारा हुलिया बयान है करता, इसलिए उसके क़द्रदान हो तुम  लेकिन उस दुनिया के हमशक्ल के, वजूद से अनजान हो तुम तुम्हारे उलटे सीधे को वो सीधा उल्टा बतलाता है, जब तक ख़ामोश रहते हो वो बेज़ुबां कहलाता है  तुम्हारे लब्जों…

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मौक़ा ख़ास है!

मौक़ा ख़ास है, शामिल है जुबां पर तेरा नाम जो वाकई में इम्तियाज़ है अफ़सोस है ज़रूर, किन्ही ना गुज़रे लम्हों का जो होते तो बरहक़ करता में मंज़ूर इस मौक़े–ख़ास में तेरा याद आना आम है, किसी आम मौक़े पर तेरा दफ़तन आ जाना याद है… क्योँ ना गिला शिकवा करू तुझसे बता मेरे…

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खौफ़नाक रातें !

अब शूमयत से बिलकुल ना रहोगे अनजान  करवाता हूँ शूम रातों से तुम्हारी पहचान! सियाह रात में शहाब की भी क्या अहमियत  जब ख़ुद महताब की फ़ितरत में आ जाए बेहमियत! वक़्त भी सरमस्त हुआ जाता इस सियाही में झलकती है साफ़ शोखी उसकी गोयाई में! सुर्ख लहू भी कबूद दिखता अँधेरे में  निग़ाह भी…

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बे-इन्तेहाँ सब्र के बाद!

बे–इन्तेहाँ सब्र के बाद, फरमान हुआ है ये जारी  तेरा ख़याल और ना होगा, ना होगी और तेरी तरफ़दारी! आख़िर हद होती है रंज की, बेसब्र दिल का लिहाज़ तो कर  रिक्कत खा उन तमाम नज़रों पर, ढूँढती हैं जो तुझे दरबदर ! मजबूर सिसकियों को रहत दे, यूँ ना बिलावजेह उन्हें ज़ायर कर  तेरे आने…

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