आख़िरी दम!

आख़िरी दम भरते हैं ये ख़यालात चंद साँसों के भरोसे टिके थे जो  सहमे हुए से हैं अब कुछ हालत  तेरी यादों के सहारे ज़िंदा थे जो  क़दम अकसर फिसल ही जाते हैं  उस डगर क...

तू अब याद नहीं आता!

कभी कभी ख्यालों में सोते–जागते कहीं खाबों में ज़िक्र अकसर जो तेरा था हो जाता कसम से, तू अब याद नहीं आता कभी खाली सूने गुज़रते पलों में निढाल बैठे ज़हन के खंड...

सूर्योदय!

रोज़ सुबह आती है, मुझे नींद के आग़ोश में पाती है सूर्योदय कभी ना देख पाता हूँ, आज–आज करते–करते निराश रह जाता हूँ उजालों में सांस लेने के बावजूद, अन्...

मुझसे मिलने की आरज़ू तूने की होगी!!

माथे पे तेरे ‘एक‘ शिकन तो रही होगी  मुझसे मिलने की आरज़ू तूने की होगी!! ज़हन मैं जो भी शिकवे थे तेरे  मेरे मातम से उसमे कमी तो हुई होगी मुझसे मिलने की...

विध्वंस!

है सोच का सागर भी असमंजस में पड़ा  क्या कभी हो पायेगा इस शोषक समाज का भला? स्वार्थ की धुंद में सुलझन का एक तट दिखाई तो दिया है परन्तु इतिहास गवाह है की परोपकार ...

छेह का पहर!

छेह का पहर खड़का, मेरा दिल धड़का हो ना हो आवाज़ है ये किसीकी, कोई मुसीबत के मारे की  मुझे बुलाता है मदद के लिए, पर कहाँ, कोई अंदाजा नहीं आवाज़ चीख में बदली, चीख ...