Manan!

रुआंसा हृदय, वेदना भरा वो हर-एक पल व्यापक था उन दिनों, मुझे भूला कर निकल पड़ा था तू घर से, स्वायत्त ! पीठ के बल चरमराते गिरे, सपने निष्फल। अकुलाहट की टीस तुझे भ...

मेरे दोस्त !

कौन बदला, हम या वक़्त मेरे दोस्त, शब्दों के माईने या हमारी सोच इंकार मत करना इससे आज, जब मैं कहता हूँ, कि किसी दिन सहसा तुम्हे भी एहसास होता है; समझदार बनने की द...

लकड़ी का मकान!

लम्बी सीधी खड़ी इमारतों के एक छोटे स्पाट घरोंदे में बंद, अक़सर याद किया करता हूँ वो लकड़ी का मकान। जिसमे गिरते-पड़ते स्कूल से भागकर पहुँचते थे, जहां कमरे की खुली खि...